रेटिंग : *** 1/2 ; कलाकार : सैफ अली खान, करीना कपूर, विवेक ऑबेरॉय और ओम पुरी। ; निर्देशक : रेंसिल डिसिल्वा
फिल्म की कहानी शुरू होती है दिल्ली कॉलेज के प्रोफेसर अवंतिका (करीना) और हाल ही में नियुक्त हुए उनके सहयोगी एहसान खान (सैफ) के बीच प्रेम कहानी से। लेकिन जैसे ही अवंतिका को न्यू यॉर्क से उनके यूनिवर्सिटी की तरफ से दुबारा आने का आमंत्रण मिलता है वैसे एहसान उसके सामने शादी का प्रस्ताव रख देते हैं। एहसान के मुस्लिम होने के कारण अवंतिका के पिता पहले इस शादी से इंकार कर देते हैं मगर बाद में एहसान को देखकर वह शादी के लिए हामी भर देते हैं। शादी के बाद दोनों न्यू यॉर्क जाते हैं और वहां एक भारतीय परिवार के पडोस में रहने लगते हैं। मगर जल्दी ही अवंतिका को यह एहसास हो जाता है कि उसका पति एक आतंकवादी गिरोह का सरगना है जो हवाई जहाज धमाके का ज़िम्मेदार है, जिसमें 140 लोग मरे थे। यह बात जानने के बाद अवंतिका एक पत्रकार रियाज़ (विवेक) के ज़रिए मामले की तह तक जाने की कोशिश करती है।
लेखक रेंसिल डिसिल्वा ने इस फिल्म के ज़रिए निर्देशन के क्षेत्र में अपना पहला कदम रखा है। मगर जिस तरह उन्होंने कुर्बान के ज़रिए दर्शकों के सामने एक रोमांचक फिल्म परोसी है उससे उन्होंने यह साबित कर दिया कि वह सिर्फ मंजे हुए लेखक ही नही बल्कि निर्देशक भी हैं। 2 घंटे 40 मिनट की इस फिल्म में जिस तरह से उन्होंने कई अजीबो गरीब मोड दिखाए हैं वह दर्शकों को अपनी सीट पर बिठाए रखने में मददगार साबित होंगे। इस फिल्म की सबसे बडी खासियत यह है कि यह इसमें बिना मतलब के या ज़बर्दस्ती ठुंसे हुए दृश्य एक भी नहीं है। साथ ही फिल्म के अंत में जिस तरह का रक्तपात दिखाया गया है वह दर्शकों पर अपना प्रभाव छोडे बिना नहीं रह पाता। निरंजन अयंगर तथा अनुराग कश्यप के संवाद फिल्म की जान है। बिना किसी तरह का कोई उपदेश दिए वह दर्शकों को काफी सही लगते हैं। क्लासरूम में विद्यार्थियों के बीच चल रहे मुस्लिम समुदाय और आतंकवाद के विवाद पर विवेक के द्वारा दिए गए उत्तर फिल्म का अत्यावश्यक भाग है। साथ ही अंत के इंतज़ार में लंबे समय तक दर्शक अपनी सीट छोड पाने में असमर्थ साबित होंगे। सैफ और करीना के बीच फिल्माए गए अंतरंग दृश्य काफी खूबसूरती से फिल्माए गए हैं। सलीम सुलेमान का संगीत अच्छा है और गाने पूरी तरह से फिल्म की थीम के साथ जाते हैं।
सैफ अली खान हमेशा से अभिनय के ज़रिए दर्शकों का ध्यान आकर्षित करते आए हैं, फिर वह चाहे नकारात्मक किरदार ही क्यों ना हो। एक बार फिर उन्होंने यह बात साबित कर दी। जिस तरह से वह अपने व्यवहार और चेहरे के हाव भाव के ज़रिए एक प्रेमी से आतंकवादी में तब्दिल होते हैं वह बेहतरीन है। करीना ने एक बार फिर से यह बात साबित कर दी कि क्यों उन्हें आज की नंबर 1 नायिका कहा जाता है। कई भावुक दृश्यों में उनकी अभिनय शैली उनकी बडी बहन करिश्मा कपूर की तरह लगती है। काफी लंबे समय बाद विवेक अपने अभिनय से दर्शकों पर प्रभाव छोडने में कामयाब हुए हैं। हमें यकीन है उनका परिपक्व अभिनय उनके लिए इस बार ढेर सारे पुरस्कार की बहार लाएगा। आतंकवादी सरगना की भूमिका में ओम पुरी ने भी अपनी अच्छी छाप छोडी है। नॉन पंजाबी मां के रोल में किरण खेर ने भी अच्छा काम किया है। दीया मिर्ज़ा और नौहीद सायरसी ने छॉती भूमिका में भी अच्छा प्रभाव छोडा है।
हेमंत चतुर्वेदी का कैमरा वर्क हॉलीवुड की फिल्मों की याद ताज़ा कर देता है साथ ही नकुल कामटे के साउंड वर्क ने भी फिल्म को बेहतरीन बनाने में अच्छी मदद की है।
अंत में करन जौहर धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने अपनी धर्मा प्रोडक्शन में इस तरह की फिल्म बनाकर फिल्म को और विशेष बना दिया है।
-सम्पूर्ण मीडिया







this is very good film i like very much. thanks to director and producer and all film unity. ok keep it up (prem sharma kafle) nepali from doha qatar.